Soniya bhatt

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कालिया दमन कथा

कालिया दमन(मर्दन) कथा


        एक दिन यमुना के तट  पर गए और गइया भी बेहोश हो गई और ग्वाल बाल  भी मूर्छित हो गए। क्योंकि यमुना का जल दुषैला हो गया था। उस यमुना में काला नाग रहता था। भगवान ने कहा की मैं इस काली को नाथुंगा। और यमुना जी को बचाऊंगा।
        एक दिन बलराम जी का जन्मदिन था और अकेले ग्वाल बालों के साथ भगवान कृष्ण ही गऊ चराने आये हैं। श्रीदामा गेंद के साथ खेलने लगे। जब खेल रहे थे तो कृष्ण जी ने जान बुझ कर यमुना में गेंद फेंक दी है।

        श्रीदामा जी बोले कन्हैया मेरी गेंद मुझे लेकर दे। कृष्ण बोले की भैया घर चल में तुझे मैया से दूसरी गेंद बनवाकर दे दूंगा। लेकिन श्रीदामा जी मचल गए और रोने लगे की नही कन्हैया मुझे मेरी गेंद ही चाहिए।
        कृष्ण बोले ठीक है भैया तू रो मत अभी लेकर देता हूँ। भगवान श्री कृष्ण जी कदम्ब  के पेड़ पर चढ़ गए। और यमुना में कूदने लगे तो सभी ग्वाल बाल हल्ला करने लगे की तू मत कूद कन्हैया इसमें बहुत बड़ा काली नाग रहता है। लेकिन भगवान ने छलांग लगा दी।
        और सीधे पहुंच गए जहाँ काली निवास करता है। उस समय काली नाग सो रहा है। और नागिन जाग रही थी। जब उन्होंने भगवान को देखा तो मन्त्र मुग्ध हो गई और नागिन कहती है-

        कृष्णा और नागिन संवाद :- 

        यह संवाद पूज्य गुरुदेव श्री मृदुल कृष्ण गोस्वामी जी और श्री गौरव कृष्ण गोस्वामी जी कथा में कहते है।

        कौन दिशा ते आयो रे बालक कौन तुम्हारो नाम है ?
        कौन सखी के पुत्र जू कहिये कौन तुम्हारो गाम है?
        
      

        नागिन भगवान से पूछती है अरे लाला तू कौन है? कहाँ से आया है? और तेरे माता पिता कौन है?

        भगवान बोले की अरी नागिन –

        पूरब दिशा दे आयो रे नागिन कृष्ण हमारो नाम है।
        मात यशोदा और पिता नन्द जू गोकुल हमारो गाम है।
        

        भगवान कहते है नागिन में पूर्व दिशा से आया हूँ। कृष्ण मेरा नाम है। माँ यशोदा और पिता नन्द जी है।

        नागिन बोली की आप यमुना में क्यों कूदे?

        कह बालक तू डगर भूल्यो, बगड़ भूल्यो कह घर नार रिसाइयां?
        या तेरे मन में क्रोध उपज्यो ना बारें बैरिन भर बाइयां।
        

        अर्थ: क्या आप रास्ता भूल गए। क्या किसी बेरी ने तुम्हारे कान भर दिए और तुम्हे गुस्सा आ गया। या अपनी पत्नी से लड़ाई करके यमुना में कूदे हो?
        भगवान कहते है-

        ना नागिन में डगर भूल्यो बगड़ भूल्यो ना घर नार रिसाइयां।
        ना मेरे मन में क्रोध उपज्यो ना बेरिन भर बाइयां।
        

        अर्थ: भगवान बोले नागिन न तो मैं रास्ता भुला हूँ न ही डगर और न मेरी अपनी पत्नी से घर में लड़ाई हुई है। और मुझे गुस्सा भी नही है और किसी बेरी ने मेरी कान भी नही भरे हैं।
        नागिन कहती है फिर बालक तुम यमुना में क्यों कूदे?

        ले बालक गलहार माला सवा लाख की बोरियां
        इतने ले घर जाओ रे बालक नाग से दूँ में चोरियां
        

        अर्थ: नागिन कहती हैं हम चोरी से(अपने नाग से छिपकर) आपको गलहार माला और सवा लाख की बोरियां देती हूँ। आप अपने घर ले जाओ।
        भगवान बोले की हमें चोरी का माल नहीं चाहिए-

        ना चाहिए गलहार माला सवा लाख की बोरियां
        मात यशोदा दही बिलोवें तेरे नाग की करूँ में डोरियां।
        

        अर्थ: भगवान बोले की नागिन मुझे चोरी की चीज नही चाहिए। मालूम है मैं यहाँ क्यों आया हूँ? देख मेरी माँ यशोदा जब दधि मंथन करेगी तो मेरी माँ को डोरी की आवश्यकता पड़ेगी तो तेरे नाग की मैं डोरी बनाउंगा। जब मेरी प्यारी राधा रानी झूला झुलेंगी तो मुझे रस्सी की आवश्यकता होगी तो तेरे नाग की मैं डोरी बनाऊंगा।
        नागिन बोली की हम इसे कितने स्नेह कर रही है और ये हमारे पति अपमान कर रहा है। हम इसे कितना स्नेह दे रही हैं। लेकिन ये मान नही रहा और उन्हें क्रोध आ गया और अपने पति को जगाने लगी की

        पैर चुम्बे भुजा मरोरे नागिन नाग जगाईयां।
        उठो-उठो बलवंत योद्धा बालक नाथन आइयाँ।
     

        नागिन अपने पति को जगाने लगी और काली नागएकदम फुंकार मार कर उठ गया और भगवान के चारों और लिपट गया। एक क्षण को तो भगवान को मूर्छा आ गई लीला में। काली ने लपेटे में भगवान को लिया। जब प्रभु को चेत आया तो अपने शरीर को फुलाना शुरू किया और काली की नस नस चटकने लगी। और काली का बंधन ढीला हो गया। जब काली का बंधन ढीला हुआ तो उसी समय भगवान उसके लपेटे से बाहर निकले और एक छोटी सी छलांग यमुना में लगाई और झट प्रभु काली के फन पर चढ़ गए। जिस फन से काली फुंकार मार रहे हैं। भगवान अपना चरण उठाकर काली के मस्तक पर प्रहार कर रहे हैं। उसकी नाक से आँख से रक्त बहने लगा। रक्त की बून्द भगवान के चरणों में पड़ी हैं।

        शुकदेव जी महाराज कहते हैं की परीक्षित ऐसा लग रहा हैं जैसे कोई भक्त नीले चरणों में लाल पुष्प चढ़ा रहा हैं। कितना सुंदर भगवान के चरण सुशोभित हो रहे हैं। जब नागिनों ने देखा तो घबरा गई और अपने बच्चो को लेकर भगवान के चरणों में प्रणाम करने लगी। प्रभु आप क्षमा कीजिये हमें क्षमा कीजिये। और हम आज ये बात समझ गई हैं। आपकी दृष्टि में शत्रु और पुत्र में कोई भेद नही हैं। नागिन कहती हैं प्रभु आपकी दृष्टि में कोई भेद नहीं हैं। आपकी दृष्टि में क्षमता हैं। पर आप जानते हैं हमारा पति काली हैं।

        बिना पति के पत्नी का जीवन बहुत कठिन हो जाता हैं। हम आपके चरणों में बार बार प्रणाम करती हैं। जब नागिन ने बार बार प्रार्थना की तो भगवान ने अपना लीला क्रोध कम किया और कालिया नाग भी बोलने लगा। जिसका पूरा मस्तक रक्त से भरा हुआ हैं। काली कहता हैं प्रभु हम तो जाति से ही दुष्ट हैं खल हैं। कितना भी हमको दूध पिलाओ फिर भी विष ही उगलेंगे। लेकिन हमें भी तो आपने ही बनाया हैं ना ।
        भगवान बोली ठीक हैं काली पर तुम वृन्दावन में नही रहोगे।

        काली बोला की मैं कहाँ जाऊं। भगवान बोले की तुम रमनदीप चले जाओ।
        काली बोला की मैं रमनदीप गया तो गरुड़ मेरा भक्षण कर लेगा। जबकि गरुड़ वृन्दावन में नहीं आ सकता था ये बात काली को मालूम थी।
        भगवान बोली की काली अब तुम्हारे मस्तक पर मेरे चरण चिन्ह हैं। गरुड़ तुम्हारा भक्षण नहीं करेगा।
        काली प्रणाम करके चले गए रमनदीप। भगवान काली को नाथ कर और एक हाथ से बंसी बजाते हुए यमुना से प्रकट हो गए।

         आध्यात्मिक पक्ष

        देखिये जितने भी असुर आये हैं भगवान ने सबको मारा हैं लेकिन काली नाग को मारा नहीं हैं। क्योंकि ये वासना का प्रतीक हैं। और वासना दो प्रकार की होती हैं। एक सांसारिक और एक भगवत वासना।

        और वासना कभी मरती नहीं हैं। ये काम का प्रतीक हैं। अंतिम क्षणों तक ये वासना रहती हैं। तो क्या करना चाहिए?

        एक उपाय हैं सांसारिक वासना को हटकर भगवत वासना को अंदर जाग्रत करें। जब ये जागृत हो जाएगी तो यह हमे भगवान के चरणो तक पहुंचा देगी। वासना और कामना को जितना हैं तो बस राम नाम-कृष्ण नाम का सहारा लीजिये।
        भगवान ने उस काली को ब्रज से निष्कासित किया हैं।

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